Monday, April 12, 2010
क्या होगा लडकों का
क्लास के 100 बच्चों में दर कुंवारे
कालेज के 1000 छात्रों में 100 रहेंगे कुंवारे
प्रदेश में एक करोड युवक शादी योग्य
दस लाख को नही मिलेगी दुल्हन
क्या होगा लडकों का
सेक्स रेशो में भारी गिरावट
2020 से 2030 के बीच लडकियों की संख्या आधी तक गिर सकती है
उल्टा दहेज देंने की नौबत
प्रदेश में लाखों लडके कुंवरे बैठे
नही मिल रही वधू
100 में से 10 लडके कुवारें रहेंगे
प्रदेश में लाखों लडके नही बांध पाऐंगे सेहरा
लडकों को शादी की चिंता
लडकियों की कमी
सामाजिक तानाबाना बिखरेगा
क्या करेंगे लाखों कुंवारे
क्या लेंगे सन्यास या एक लडकी से होगी दो लडकों की शादी या फिर संमलैंगिकता बढेगी या करेंगे अपराध
समाज के सामने कई सवाल
सोनोग्राफी का नतीजा आना बाकी
लडकियों की पेट में हत्या का असर आना बाकी
2010 में लडकियों की तादात आधी रह जाएगी
2010 में आधे लडके कुंवारे रहेंगे
अभी भी हालात बिगडे
युवाओं को नही मिल रही शादी योग्य युवतियां
लडकों के लिए खतरे की घंटी बज गई है। मां बाप परेशान हैं लडका शादी के लायक हो गया है लेकिन ढूंढे से भी नही मिल रही बहू। पांच पांच लडके बैठे है बिना शादी के। ये भविष्य के नही वर्तमान के हालात हैंे जी हां लाखों लडकों को शादी के लिए दुल्हन का इंतजार है। हजारों लडके 40 के बाद भी कुंवारे हैं। प्रदेश में लडकियों की संख्या हजार पर नौसौ से भी कम हैं। येे हालात तब है जब 20 साल पहले भ्रण परीक्षण की सुविधा नही थी गर्भ में ही लडकियों की पहचान संभव नही थी। आधुनिक तकनीक के चलते लडकियांे की भ्रूण हत्या के नतीजे तो अभी आना बाकी है। पिछले दस सालों में इस तकनीक से जो हुआ है उसका अनुमान लगाया जाए तो 2020 में लडकियों की तादात 1000 पर 500 से 700 से ज्यादा नही रहेगी ये हो चुका है इसलिए तैयार रहिए 2020 में दुल्हन ढूंढे से नही मिलेगी ऐंसे में सामाजिक तानाबाना बिगडेगा अराजकता फैलेगी।
लडकियांे के दिन फिरने वाले हैं अब दहेज के लिए कोई उन्हे परेशान नही करेगा अब दुल्हनों को ससुराल से नही भगाया जाऐगा। मां बाप को लडकी की शादी की चिंता नही सताऐेगी। पति पत्नियों को घर से निकाल दूसरी शादी करने की धमकी नही देंगे अब वाकई नारियां पुजेगी दहेज लडके वाले नही लडकी वाले देंगे ! लडकियों को शायद ये हसीन सपना लगे लेकिन ये सपना नही है हकीकत बनते जा रहा है। जी हां वक्त बदल गया है दुल्हन बनने वाली लडकियों का टोटा पड गया है जनसंख्या की गणना अभी जारी है अगले साल देख लीजिए नतीजे क्या आते है लेकिन हम आपको अभी से अनुमानित आंकडा बता देते हैं लडकियों की संख्या 1000 लडकों पर 900 से कम हो चुकी है शायद वास्तविक हालात इससे भी ज्यादा चैकाने वाले है। जाहिर सी बात है प्रदेश के शादी योग्य एक 50 लाख लडकों में से 5 लाख को शादी के लिए दुल्हन नही मिल रही । एक रिसर्च बता रही है कुवारे लडकों की उम्र बढती जा रही है 40 , 40 साल के लडके कुंवारे बैठे है मा बाप मैरिज ब्यूरो के चक्कर काट रहे हैंे अखबारों में विज्ञापन दे रहे है लेकिन वधू नही मिल रही वैवाहिकी मै शादी योग्य लडकियों के लिए वर चाहिए के विज्ञापन कम होते जा रहे है और वधू चाहिए के विज्ञापन बढते जा रहे हैं। आपके जहन में ये सवाल जरूर आ रहा होगा कि 1991 और 2001 की जनगणना में भी लडकिया लडकों की तुलना में कम थी तब ऐंसे हालात क्यू पैदा नही हुए अब इसे जरा साइंटीफिक तरीके से समझने की कोशिश कीजिए। दरअसल 1991 की जनगणना के मुताबिक 1000 पर 945 लडकियां थी लेकिन उस वक्त शादी योग्य युवक युवतियों का अनुपात बराबर था उस वक्त अंतर बच्चे बच्चियों के अनुपात में था । 2001 में 1000 पर 927 लडकियां रह गई तब भी शादी योग्य युवतियों का अनुपात लगभग बराबर था लेकिन इसका असर अब दिख है क्योंकि ये बच्चे बडे हो गए और शादी योग्य युवक युवतियों का अनुपात 1991 और 2001 की तुलना में बराबर नही बल्कि 1000 पर 900 के लगभग पहुच गया है । अब अपने आस पास देखिए कितने लडके कुंवारे हैं और कितनी लडकिया अंतर साफ समझ आऐगा। अब सवाल ये उठता है कि 2010 में लडकियों की तादाद इतनी क्यों गिरी क्योंकि 1970 से 1980 के दशक में तो पेट में लडके लडकियों पहचान कर लडकियों को गर्भ में मार देने की तकनीक ही नही थी ये बिल्कुल सही है लेकिन तब तक नसबंदी शुरू हो चुकी थी लोगों ने इसका फायदा उठाया एक या दो लडके हुए तो नसबंदी करा ली और लडकियों को पैदा ही नही होने दिया इसी से 1000 पर 900 लडकियां रह गई। सोनोग्राफी से लडकियों की पहचान कर लडकियांे की भ्रण हत्या का असर तो अगली पीढी देखेगी अनुमान है कि आच के बच्चे जब युवा हांेंगे तो लडकिया की तादात 1000 लडकों पर 500 से 700 के बीच ही रह जाऐगी । ये हालात माथे पर सिलवटें डालने वाले है और आने वाले समय मै सामाजिक ढांचे को ही खतरें में डाल सकते हैं। हमारे भारतीय समाज में लड़कियों से भेदभाव रखने की मानो एक परंपरा रही है, कम से कम मध्यकाल से तो ऐसा है ही। तब लड़कियों को जन्म के समय ही मार दिया जाता था और ज्यादातर पुरूष युद्ध में मारे जाते थे। इस तरह बहुत हद तक जनसंख्या लिंगानुपात सामान्य बना रहता था। नवजात लड़कियों से छुटकारा पाने के लिए जहर देना या भूसे के ढेर पर दम घुटने के लिए छोड़ देना कुछ पारंपरिक तरीके थे। इन तरीकों का की जगह सोनोग्राफी आदि जैसी उच्च चिकित्सा तकनीकों ने ले लिया है, जिनसे पता चलता है कि कोख में पलने वाले बच्चे का लिंग क्या है। नतीजतन किसी नवजात की हत्या नहीं करनी पड़ती, भूण हत्या से ही काम चला लिया जाता है। इससे जनसंख्या लिंगानुपात में बड़ा अंतर आ गया है, जिसके नतीजे निश्चित तौर पर सुखद नहीं हैं।
सन 2001 की जनगणना में जनसंख्या का लिंगानुपात 933 महिलाएं प्रति 1000 पुरूष था। 1991 से 2001 में बच्चों के लिंगानुपात में गिरावट आई है। जो अनुपात 1991 में 945 लड़कियां प्रति 1000 लड़का था जो घटकर 2001 में 927 लड़कियां प्रति 1000 लड़कों तक रह गया। कुछ राज्यों में जनसंख्या के लिंगानुपात और राष्ट्रीय जनसंख्या लिंगानुपात में आश्चर्यजनक रूप से अंतर है। जैसे, पंजाब-798, हरियाणा 819 दिल्ली 688 गुजरात 883 हिमाचल 896 उत्तरांचल 908 राजस्थान 909 महाराष्ट्र 913 और मध्य प्रदेश में 919 महिलाएं प्रति 1000 पुरूष। लिंगानुपात में आ रही यह गिरावट कितनी चिंताजनक है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां 1991 में 800 से कम के लिंगानुपात वाला एक भी जिला नहीं था, वहीं 2001 में ऐसे जिलों की संख्या 14 है। इसी तरह पहले ऐसा एकमात्र जिला था जहां लिंगानुपात 800 से 850 के बीच में था लेकिन ऐसे जिले 31 हो गए हैं। देश के 116 जिलों में यह अनुपात 900 से कम है। इस तरह के चलन को सोनोग्राफी जैसी सुविधाओं ने एक अतिरिक्त गति दे दी है। सोनोग्राफी जैसी सुविधाएं लोगों को आसानी से मिल भी जाती हैं। यहां तक कि यह मध्यप्रदेश के सुदूर जिले मुरैना में भी उपलब्ध है। मई, 2005 में इस जिले के सभी गांवो में घर-घर किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि यहां का लिंगानुपात चिंताजनक स्थिति तक पहुंच गया है। मध्यप्रदेश के बारह जिलों में बाल लिंगानुपात 900 के नीचे जा पहुंचा है, लेकिन इंदौर जिला दुनिया की आधी आबादी के लिए उम्मीद जगा रहा है, जहां पिछले चार साल में बाल लिंगानुपात 836 से बढ़कर 912 हो गया है। बेटियों की कोख में ही हत्या के मामले में मध्यप्रदेश पंजाब और हरियाणा के समकक्ष पहुंचता जा रहा है। इन राज्यों में लड़कियों की लगातार घटती संख्या चिंता का विषय बनी हुई है। श्मध्यप्रदेश के बारह जिलों में प्रति हजार बालकों पर 900 से कम बालिकाएं हैं। कन्या भ्रूण हत्या एक सामाजिक समस्या है, जिसके दुष्परिणाम लगातार सामने आ रहे हैं। फिलहाल 2011 के लिए जनगणना का काम शुरू हो चुका है जिसके नतीजे चैकाने वाले ही होगे।
अतुल पाठक
कालेज के 1000 छात्रों में 100 रहेंगे कुंवारे
प्रदेश में एक करोड युवक शादी योग्य
दस लाख को नही मिलेगी दुल्हन
क्या होगा लडकों का
सेक्स रेशो में भारी गिरावट
2020 से 2030 के बीच लडकियों की संख्या आधी तक गिर सकती है
उल्टा दहेज देंने की नौबत
प्रदेश में लाखों लडके कुंवरे बैठे
नही मिल रही वधू
100 में से 10 लडके कुवारें रहेंगे
प्रदेश में लाखों लडके नही बांध पाऐंगे सेहरा
लडकों को शादी की चिंता
लडकियों की कमी
सामाजिक तानाबाना बिखरेगा
क्या करेंगे लाखों कुंवारे
क्या लेंगे सन्यास या एक लडकी से होगी दो लडकों की शादी या फिर संमलैंगिकता बढेगी या करेंगे अपराध
समाज के सामने कई सवाल
सोनोग्राफी का नतीजा आना बाकी
लडकियों की पेट में हत्या का असर आना बाकी
2010 में लडकियों की तादात आधी रह जाएगी
2010 में आधे लडके कुंवारे रहेंगे
अभी भी हालात बिगडे
युवाओं को नही मिल रही शादी योग्य युवतियां
लडकों के लिए खतरे की घंटी बज गई है। मां बाप परेशान हैं लडका शादी के लायक हो गया है लेकिन ढूंढे से भी नही मिल रही बहू। पांच पांच लडके बैठे है बिना शादी के। ये भविष्य के नही वर्तमान के हालात हैंे जी हां लाखों लडकों को शादी के लिए दुल्हन का इंतजार है। हजारों लडके 40 के बाद भी कुंवारे हैं। प्रदेश में लडकियों की संख्या हजार पर नौसौ से भी कम हैं। येे हालात तब है जब 20 साल पहले भ्रण परीक्षण की सुविधा नही थी गर्भ में ही लडकियों की पहचान संभव नही थी। आधुनिक तकनीक के चलते लडकियांे की भ्रूण हत्या के नतीजे तो अभी आना बाकी है। पिछले दस सालों में इस तकनीक से जो हुआ है उसका अनुमान लगाया जाए तो 2020 में लडकियों की तादात 1000 पर 500 से 700 से ज्यादा नही रहेगी ये हो चुका है इसलिए तैयार रहिए 2020 में दुल्हन ढूंढे से नही मिलेगी ऐंसे में सामाजिक तानाबाना बिगडेगा अराजकता फैलेगी।
लडकियांे के दिन फिरने वाले हैं अब दहेज के लिए कोई उन्हे परेशान नही करेगा अब दुल्हनों को ससुराल से नही भगाया जाऐगा। मां बाप को लडकी की शादी की चिंता नही सताऐेगी। पति पत्नियों को घर से निकाल दूसरी शादी करने की धमकी नही देंगे अब वाकई नारियां पुजेगी दहेज लडके वाले नही लडकी वाले देंगे ! लडकियों को शायद ये हसीन सपना लगे लेकिन ये सपना नही है हकीकत बनते जा रहा है। जी हां वक्त बदल गया है दुल्हन बनने वाली लडकियों का टोटा पड गया है जनसंख्या की गणना अभी जारी है अगले साल देख लीजिए नतीजे क्या आते है लेकिन हम आपको अभी से अनुमानित आंकडा बता देते हैं लडकियों की संख्या 1000 लडकों पर 900 से कम हो चुकी है शायद वास्तविक हालात इससे भी ज्यादा चैकाने वाले है। जाहिर सी बात है प्रदेश के शादी योग्य एक 50 लाख लडकों में से 5 लाख को शादी के लिए दुल्हन नही मिल रही । एक रिसर्च बता रही है कुवारे लडकों की उम्र बढती जा रही है 40 , 40 साल के लडके कुंवारे बैठे है मा बाप मैरिज ब्यूरो के चक्कर काट रहे हैंे अखबारों में विज्ञापन दे रहे है लेकिन वधू नही मिल रही वैवाहिकी मै शादी योग्य लडकियों के लिए वर चाहिए के विज्ञापन कम होते जा रहे है और वधू चाहिए के विज्ञापन बढते जा रहे हैं। आपके जहन में ये सवाल जरूर आ रहा होगा कि 1991 और 2001 की जनगणना में भी लडकिया लडकों की तुलना में कम थी तब ऐंसे हालात क्यू पैदा नही हुए अब इसे जरा साइंटीफिक तरीके से समझने की कोशिश कीजिए। दरअसल 1991 की जनगणना के मुताबिक 1000 पर 945 लडकियां थी लेकिन उस वक्त शादी योग्य युवक युवतियों का अनुपात बराबर था उस वक्त अंतर बच्चे बच्चियों के अनुपात में था । 2001 में 1000 पर 927 लडकियां रह गई तब भी शादी योग्य युवतियों का अनुपात लगभग बराबर था लेकिन इसका असर अब दिख है क्योंकि ये बच्चे बडे हो गए और शादी योग्य युवक युवतियों का अनुपात 1991 और 2001 की तुलना में बराबर नही बल्कि 1000 पर 900 के लगभग पहुच गया है । अब अपने आस पास देखिए कितने लडके कुंवारे हैं और कितनी लडकिया अंतर साफ समझ आऐगा। अब सवाल ये उठता है कि 2010 में लडकियों की तादाद इतनी क्यों गिरी क्योंकि 1970 से 1980 के दशक में तो पेट में लडके लडकियों पहचान कर लडकियों को गर्भ में मार देने की तकनीक ही नही थी ये बिल्कुल सही है लेकिन तब तक नसबंदी शुरू हो चुकी थी लोगों ने इसका फायदा उठाया एक या दो लडके हुए तो नसबंदी करा ली और लडकियों को पैदा ही नही होने दिया इसी से 1000 पर 900 लडकियां रह गई। सोनोग्राफी से लडकियों की पहचान कर लडकियांे की भ्रण हत्या का असर तो अगली पीढी देखेगी अनुमान है कि आच के बच्चे जब युवा हांेंगे तो लडकिया की तादात 1000 लडकों पर 500 से 700 के बीच ही रह जाऐगी । ये हालात माथे पर सिलवटें डालने वाले है और आने वाले समय मै सामाजिक ढांचे को ही खतरें में डाल सकते हैं। हमारे भारतीय समाज में लड़कियों से भेदभाव रखने की मानो एक परंपरा रही है, कम से कम मध्यकाल से तो ऐसा है ही। तब लड़कियों को जन्म के समय ही मार दिया जाता था और ज्यादातर पुरूष युद्ध में मारे जाते थे। इस तरह बहुत हद तक जनसंख्या लिंगानुपात सामान्य बना रहता था। नवजात लड़कियों से छुटकारा पाने के लिए जहर देना या भूसे के ढेर पर दम घुटने के लिए छोड़ देना कुछ पारंपरिक तरीके थे। इन तरीकों का की जगह सोनोग्राफी आदि जैसी उच्च चिकित्सा तकनीकों ने ले लिया है, जिनसे पता चलता है कि कोख में पलने वाले बच्चे का लिंग क्या है। नतीजतन किसी नवजात की हत्या नहीं करनी पड़ती, भूण हत्या से ही काम चला लिया जाता है। इससे जनसंख्या लिंगानुपात में बड़ा अंतर आ गया है, जिसके नतीजे निश्चित तौर पर सुखद नहीं हैं।
सन 2001 की जनगणना में जनसंख्या का लिंगानुपात 933 महिलाएं प्रति 1000 पुरूष था। 1991 से 2001 में बच्चों के लिंगानुपात में गिरावट आई है। जो अनुपात 1991 में 945 लड़कियां प्रति 1000 लड़का था जो घटकर 2001 में 927 लड़कियां प्रति 1000 लड़कों तक रह गया। कुछ राज्यों में जनसंख्या के लिंगानुपात और राष्ट्रीय जनसंख्या लिंगानुपात में आश्चर्यजनक रूप से अंतर है। जैसे, पंजाब-798, हरियाणा 819 दिल्ली 688 गुजरात 883 हिमाचल 896 उत्तरांचल 908 राजस्थान 909 महाराष्ट्र 913 और मध्य प्रदेश में 919 महिलाएं प्रति 1000 पुरूष। लिंगानुपात में आ रही यह गिरावट कितनी चिंताजनक है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां 1991 में 800 से कम के लिंगानुपात वाला एक भी जिला नहीं था, वहीं 2001 में ऐसे जिलों की संख्या 14 है। इसी तरह पहले ऐसा एकमात्र जिला था जहां लिंगानुपात 800 से 850 के बीच में था लेकिन ऐसे जिले 31 हो गए हैं। देश के 116 जिलों में यह अनुपात 900 से कम है। इस तरह के चलन को सोनोग्राफी जैसी सुविधाओं ने एक अतिरिक्त गति दे दी है। सोनोग्राफी जैसी सुविधाएं लोगों को आसानी से मिल भी जाती हैं। यहां तक कि यह मध्यप्रदेश के सुदूर जिले मुरैना में भी उपलब्ध है। मई, 2005 में इस जिले के सभी गांवो में घर-घर किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि यहां का लिंगानुपात चिंताजनक स्थिति तक पहुंच गया है। मध्यप्रदेश के बारह जिलों में बाल लिंगानुपात 900 के नीचे जा पहुंचा है, लेकिन इंदौर जिला दुनिया की आधी आबादी के लिए उम्मीद जगा रहा है, जहां पिछले चार साल में बाल लिंगानुपात 836 से बढ़कर 912 हो गया है। बेटियों की कोख में ही हत्या के मामले में मध्यप्रदेश पंजाब और हरियाणा के समकक्ष पहुंचता जा रहा है। इन राज्यों में लड़कियों की लगातार घटती संख्या चिंता का विषय बनी हुई है। श्मध्यप्रदेश के बारह जिलों में प्रति हजार बालकों पर 900 से कम बालिकाएं हैं। कन्या भ्रूण हत्या एक सामाजिक समस्या है, जिसके दुष्परिणाम लगातार सामने आ रहे हैं। फिलहाल 2011 के लिए जनगणना का काम शुरू हो चुका है जिसके नतीजे चैकाने वाले ही होगे।
अतुल पाठक
Sunday, April 11, 2010
Monday, February 1, 2010
बच्चों की भडास
बच्चों की भडास चिल्ड्रन्स डे पर भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदेश भर के करीब 14 जिलांे के दलित बच्चे एक मंच पर इकट्ठा हुए। अपनों के बीच बच्चों की हिम्मत बढ़ी ओर इसके बाद उन्होंने अपने साथ हो रहे अन्याय को बताना शुरू कर दिया। होशंगाबाद जिले के ईश्पुर में रहने वाले यशवंत कुमार ने बताया कि दलित होने के कारण उसे मध्यान भोजन की रोटी फैंक कर दी जाती है। गांव में भी उससे लोग छुआ छूत करते हैं। मुरैना की रहने वाली नीता छारी का दर्द ये था कि उसे काफी प्रयासों के बाद भी स्कालरशिप नहीं मिल सकी। होशंगाबाद का नीलेश अपने समाज के उत्थान के लिए बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित कर रहा है। इन बच्चों की पीड़ा ने ये जाहिर कर दिया कि तमाम सरकारी प्रयासों के बाद आज भी दलित वर्ग के छात्र छूआछत ओर दूसरी समस्याओं से ग्रसित हैं। आजादी के साठ साल बाद भी ये अपने संवैधानिक हक से महरूम हैं। आजादी के समय सन 1951 में दलित साक्षरता की दर 1 ़ 90 प्रतिशत थी जबकि गैर दलितों में 18 ़ 33 प्रतिशत साक्षरता दर थी। उस समय साक्षरता प्रतिशत का अंतर 16 प्रतिशत था। आज वर्ष 2001 की स्थिति में 54 ़69 प्रतिशत दलित साक्षर हैं ओर गैर दलितों का ये प्रतिशत 64 ़84 है। यानि आज भी दलित ओर गैर दलितों के बीच 10 ़45 प्रतिशत का अंतर है। कहने का मतलब ये कि इतने सालों में केवल 8 प्रतिशत की ही खाई पाटी जा सकी। मध्य प्रदेश के दलित बच्चों में यदि शिक्षा की स्थिति देखी जाए तो 45 प्रतिशत बच्चे कक्षा पांचवी तक पहुंचते पहुंचते स्कूल छोड़ देते हैं। शेष में से भी 45 प्रतिशत बच्चे कक्षा 6 वीं से 8 वीं तक आते आते स्कूल छोड़ देते हैं। शेष बचे 10 प्रतिशत बच्चों में से भी केवल 1 या 2 प्रतिशत बच्चे ही उच्च शिखा तक पहुंच पाते हैं। इस प्रकार दलित ग्रामीण क्षेत्र में आज भी बच्चे शाला में दर्ज तो होते हैं परंतु शिक्षा पूरी नहीं कर पाते।
बाल नियोजको की शवयात्रा
14 साल से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी करवाना कानून जुर्म है ये बात सभी जनाते है लेकिन खुलेआम इस कानून का उल्लंघन करने वाले बाज नही आते। बाल नियाजकों को उनकी गलती का अहसास दिलाने के लिए राजधानी के बच्चों ने उनकी शवयात्रा निकाली काले पहनकर बाल नियोजको की शवयात्रा निकालने के साथ साथ बच्चों ने गधांे और तख्तियों के जरिए भी अपना विरोध जताया। ढाबे रेस्त्रां आफिसों और घरों में बच्चों से काम न कराने के लिए सरकार ने कठोर कानून और योजनाऐ बना तो दी लेकिन इनका सही क्रियान्वयन न होने से बाल मजदूरी आज भी जारी है।
Tuesday, January 26, 2010
कौन लिख रहा है इन नौनिहालों की तकदीर
कौन लिख रहा है इन नौनिहालों की तकदीर
अगर वास्तव में बच्चे किसी देश का भविष्य है तो भारत का भविष्य अंधकारमय है। भविष्य का भारत अनपढ़, दुर्बल और लाचार है। कोई भी इनका अपहरण, अंग-भंग, यौन शोषण कर सकता है और बंधुआ बना सकता है।
हर साल बच्चों के प्रिय चाचा जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। बड़ी-बड़ी बातें की जाती है, लेकिन साल-दर-साल उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।
भारत में बाल-मजदूरी पर प्रतिबंध लगे 23 साल हो गए है, लेकिन विश्व में सबसे ज्यादा बाल मजदूर यहीं हैं। इनकी संख्या करीब छह करोड़ है। खदानों, कारखानों, चाय बागानों, होटलों, ढाबों, दुकानों आदि हर जगह इन्हें कमरतोड़ मेहनत करते हुए देखा जा सकता है। कच्ची उम्र में काम के बोझ ने इनके चेहरे से मासूमियत नोंच ली है।
इनमें से अधिकतर बच्चे शिक्षा से दूर खतरनाक और विपरीत स्थितियों में काम कर रहे है। उन्हें हिंसा और शोषण का सामना करना पड़ता है। इनमें से कई तो मानसिक बीमारियों के भी शिकार हो जाते हैं। बचपन खो करके भी इन्हे ढग से मजदूरी नहीं मिलती।
भारत में अशिक्षा, बेरोजगारी और असंतुलित विकास के कारण बच्चों से उनका बचपन छीनकर काम की भट्ठी में झोंक दिया जाता है। इसलिए जब तक इन समस्याओं का हल नहीं किया जाएगा, तब तक बाल श्रम को रोकना असंभव है। ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि सभी बच्चों को मुफ्त और बेहतर शिक्षा मिल सके। हर परिवार को कम से कम रोजगार, भोजन और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों। साथ ही बाल-मजदूरी से जुड़े सभी कानून और सामाजिक-कल्याण की योजनाएं कारगर ढंग से लागू हों।
देश में बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। ब्रिटेन की एक संस्था के सर्वे के अनुसार पूरी दुनिया में जितने कुपोषित बच्चे हैं, उनकी एक तिहाई संख्या भारत में है। यहा तीन साल तक के कम से कम 46 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसके अलावा प्रतिदिन औसतन 6,000 बच्चों की मौत होती है। इनमें 2,000 से लेकर 3,000 बच्चों की मौत कुपोषण के कारण होती है।
भारत में बच्चों का गायब होना भी एक बड़ी समस्या है। इनमें से अधिकतर बच्चों को संगठित गिरोहों द्वारा चुराया जाता है। ये गिरोह इन मासूमों से भीख मंगवाते हैं। अब तो मासूम बच्चों से छोटे-मोटे अपराध भी कराए जाने लगे है। पिछले एक साल में दिल्ली मे दो हजार से ज्यादा बच्चे गायब हुए। इन्हें कभी तलाश ही नहीं किया गया, क्योंकि ये सभी बच्चे बेहद गरीब घरों के थे।
यह स्थिति तो देश की राजधानी दिल्ली की है। पूरे देश की क्या स्थिति होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अगर गायब होने वाला बच्चा समृद्ध परिवार का होता है तो शासन और प्रशासन में ऊपर से लेकर नीचे तक हड़कंप मच जाता है।
यदि बच्चा गरीब घर से ताल्लुक रखता है तो पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती। पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई थी कि वह सिर्फ अमीरों के बच्चों को तलाशने में तत्परता दिखाती है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 80 प्रतिशत पुलिस वाले गुमशुदा बच्चों की तलाश में रुचि नहीं लेते। भारत में हर साल लगभग 45 हजार बच्चे गायब होते हैं और इनमें से 11 हजार बच्चे कभी नहीं मिलते।
संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव में 2007 मे भारत में बाल अधिकार संरक्षण आयोग गठित किया गया था। आयोग ने गुमशुदा बच्चों के मामले मे राच्य सरकारों को कई सुझाव और निर्देश दिए थे। इनमें से एक गुम होने वाले हर बच्चे की एफआईआर तुरंत दर्ज किए जाने के संदर्भ में था, लेकिन सच्चाई सबके सामने है।
बाल विवाह एक और बड़ी समस्या है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में जिन लड़कियों की बचपन में शादी कर दी जाती है, उनमें एक तिहाई से भी ज्यादा भारत से हैं। सालभर में लाखों बच्चिया इसके लिए अभिशप्त है। इन्हें भीषण शारीरिक और मानसिक यातना झेलनी पड़ती है।
बाल विवाह पर प्रतिबंध के बावजूद रीति-रिवाज, पिछड़ेपन ओर रूढि़वादिता के कारण अब भी देश के कई हिस्सों में लड़कियों को विकास का अवसर दिए बिना अंधे कुंए में धकेला जा रहा है। छोटी उम्र में विवाह से कई बार लड़कियों को बाल वैधव्य का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका जीवन मुसीबतों से घिर जाता है।
इसके अलावा बाल विवाह से कई बार वर-वधू के शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक विकास में विपरीत असर पड़ता है। बाल विवाह के कारण लड़कियों की पढ़ाई रुक जाती है। कम पढ़ी-लिखी महिला अंधविश्वासों और रूढि़यों से घिर जाती है। ऐसी पीढ़ी से देश व समाज हित की क्या उम्मीद की जा सकती है?
इससे दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि करीब 53 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण के शिकार हैं। इनमें केवल लड़किया ही नहीं, बल्कि लड़के भी हैं। पाच साल से 12 साल की उम्र के बीच यौन शोषण के शिकार होने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो बच्चों के मामले में भारत की स्थिति सबसे खराब है। प्रशासनिक अधिकारियों को इस तरह की कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती कि वह बच्चों के प्रति संवेदशनील होकर अपने दायित्व को समझें। बच्चे वोट बैंक नहीं होते इसलिए राजनीतिक पार्टिया दिखावे के लिए भी उनकी चिंता नहीं करतीं। सब बातें छोड़ भी दें तो सरकार बच्चों के लिए बेसिक शिक्षा तक नहीं उपलब्ध करवा पा रही है।
पूरे देश में स्कूलों का अब भी अभाव है। जहा स्कूल है भी, वहा कुव्यवस्था है। कहीं अध्यापकों की कमी है तो कहीं जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। 10 सितंबर को दिल्ली के खजूरी खास स्थित राजकीय वरिष्ठ बाल/बालिका विद्यालय में परीक्षा से पूर्व मची भगदड़ में पाच छात्रों की मौत हो गई थी, जबकि 32 छात्राएं घायल हुई थीं। इसके पीछे मुख्य वजह कुव्यवस्था थी। यह स्थिति देश की राजधानी की है। इससे पता चलता है कि हम देश के भविष्य के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्य संध्या बजाज का कहना है कि गुमशुदा बच्चों के अधिकाश मामलों में रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती। गुम होने वाले ज्यादातर बच्चे शोषण का शिकार होते है। इसलिए हर गुमशुदा बच्चे की रिपोर्ट जरूर दर्ज की जानी चाहिए। बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिलने से उनकी जिदंगी और बेहतर बन जाएगी।
हम उनसे सबक क्यों नहीं लेते
कई देशों में बच्चों के लिए अलग से लोकपाल नियुक्त हैं। सबसे पहले नार्वे ने 1981 में बाल अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक अधिकारों से युक्त लोकपाल की नियुक्ति की। बाद में आस्ट्रेलिया, कोस्टारिका, स्वीडन [1993], स्पेन [1996], फिनलैंड आदि देशों ने भी बच्चों के लिए लोकपाल की नियुक्ति की।
लोकपाल का कर्तव्य है बाल अधिकार आयोग के अनुसार बच्चों के अधिकारों को बढ़ावा देना और उनके हितों का समर्थन करना। यही नहीं, निजी और सार्वजनिक प्राधिकारियों में बाल अधिकारों के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करना भी उनके दायित्वों में है। कुछ देशों में तो लोकपाल सार्वजनिक विमर्शो में भाग लेकर जनता की अभिरुचि बाल अधिकारों के प्रति बढ़ाते हैं और जनता व नीति निर्धारकों के रवैये को प्रभावित करते हैं।
बच्चों के शोषण एवं बालश्रम की समस्याओं के मद्देनजर भारत में भी बच्चों के लिए स्वतंत्र लोकपाल व्यवस्था गठित करने की मांग अक्सर की जाती रही है, लेकिन सवाल यह है कि इतने संवैधानिक उपबंधों, नियमों-कानूनों, मंत्रालयों और आयोगों के बावजूद अगर बच्चों के अधिकारों का हनन हो रहा है तो समाज भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
कल हर बच्चा अपनी पुरानी पीढ़ी से मांगेगा हिसाब
कैलाश सत्यार्थी। हर साल की तरह फिर से 14 नवंबर यानी बाल दिवस आ गया। हर साल की तरह बच्चों के मसीहा चाचा नेहरु को याद करने का दिन। बच्चों को देश का भविष्य और कर्णधार बताने, उनकी तरक्की और शिक्षा के नए वायदे करने, स्कूली बच्चों के बीच कार्यक्रम करके नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षा-व्यापारियों के फोटो खिंचवाने और अखबार में खबर छपवाने का दिन।
आखिर कब तक हमारा देश अपने आपको और उन मासूम बच्चों को धोखा देता रहेगा, जिन्हें अब तक वह भरपेट रोटी और आजादी जैसी बुनियादी चीजें भी मुहैया नहीं करा सका। शिक्षा, स्वास्थ्य, बचपन का स्वाभिमान और भविष्य की गारंटी तो दूर की बात है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हाल ही में यूनीसेफ ने खुलासा किया है था कि दुनिया भर में पाच साल से कम उम्र में मौत के मुंह में समा जाने वाले लगभग 97 लाख बच्चों में से 21 लाख भारत के होते हैं। कम वजन के पैदा होने वाले साढ़े पंद्रह करोड़ शिशुओं में से साढ़े पाच करोड़ हमारे देश के होते हैं।
पाच से छह करोड़ बच्चे बाल मजदूरी के शिकार हैं। लाखों बच्चे जानवरों से भी कम कीमत में एक से दूसरी जगह खरीदे और बेचे जाते हैं। 40-50 हजार बच्चे मोबाइल फोन, बटुए, खिलौने या किसी सामान की तरह हर साल गायब कर दिए जाते हैं। अकेले देश की राजधानी दिल्ली में हर रोज औसतन छह बच्चे गायब किए जाते हैं। सड़कों पर जबरिया भीख मंगवाने के लिए अंधा बनाकर या हाथ-पाव काटने की कहानी स्लमडाग मिलियनायर की कल्पना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की असलियत है।
शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब किसी मासूम बच्ची से बलात्कार करने या उसकी हत्या कर देने की घटनाएं अखबारों में देखने को न मिलती हों। घरेलू बाल मजदूरी रोकने के लिए दो साल पहले एक कठोर कानूनी प्रावधान लाया गया था, लेकिन कभी किसी अदाकारा के घर तो कभी सरकारी अधिकारी और तथाकथित मध्यवर्गीय शिक्षित व्यवसायी के घर घरेलू बाल नौकरानियों को गर्म लोहे से दाग देने या बुरी तरह मारपीट करने की घिनौनी वारदातें आए दिन सामने आती हैं। मीडिया में थोड़ा बहुत शोर शराबा हो जाता है। अधिकारियों और स्वयंसेवी संगठनों के नेताओं के बाइट किसी चैनल में एक दो दिन चल जाते हैं और फिर वही ढाक के तीन पात।
बाल दिवस की रस्म अदायगी करने से पहले हमें अपने अंदर झाकना चाहिए। निजी सार्वजनिक और राजनैतिक ईमानदारी की भी जाच पड़ताल करनी चाहिए। अपनी खुद की संतानों के भविष्य को संवारने के लिए जो लोग घूसखोरी और भ्रष्टाचार तक में लिप्त पाए जाते हैं, वे दूसरों के बच्चों को गुलाम बनाने से नहीं कतराते। अपने बच्चों को महंगे से महंगे अंग्रेजी स्कूलों में दाखिल कराने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते हैं, लेकिन किसी चाय के ढाबे पर बेशर्मी से बच्चे के हाथ की चाय पीते हुए या जूते पालिश कराते हुए उन्हें यह एहसास तक नहीं होता कि भारत का भविष्य सिर्फ उनके बाल-गोपाल ही नहीं, दूसरे बच्चे भी हैं।
सार्वजनिक जीवन में दोहरे मानदंड की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि नेता-अधिकारी और अधिकारों की बात करने वाले बुद्धिजीवी कुतर्को का अंबार लगा देते हैं। मसलन, गरीब का बच्चा काम नहीं करेगा तो भूखा मर जाएगा या लड़की वेश्यावृत्ति करने लगेगी, इसलिए बेहतर है कि वह बाल मजदूरी करे। कुछ लोग कहते हैं कि देश के पास इतने संसाधन कहा कि हर बच्चे का गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई मुहैया कराई जा सके। यदि गरीब बच्चों को मंहगे अंग्रेजी स्कूलों में जबरन भर्ती कराया जाएगा तो वहा शिक्षा का स्तर खराब हो जाएगा आदि।
आखिर हम कब तक बच्चों के वर्तामन और भविष्य के साथ पाखंड करते रहेंगे? कब तक उनको धोखा देते रहेंगे? यह सच है कि अधिकाश बच्चे आज अपने आकाओं से जवाब मागने का माद्दा नहीं रखते, लेकिन आने वाले कल की असलियत आज से एकदम अलग होगी यह तय समझिए। सदियों से चले आ रहे पाखंड और बचपन विरोधी परंपराओं को कुछ बच्चों ने चुनौती देना शुरू कर दिया है। यह सैलाब रुकने वाला नहीं हैं। कल हर बच्चा अपनी पुरानी पीढ़ी से हिसाब जरूर मागेगा, तब हम उन्हें क्या जवाब देंगे?
साभार - दैनिक जागरण
अगर वास्तव में बच्चे किसी देश का भविष्य है तो भारत का भविष्य अंधकारमय है। भविष्य का भारत अनपढ़, दुर्बल और लाचार है। कोई भी इनका अपहरण, अंग-भंग, यौन शोषण कर सकता है और बंधुआ बना सकता है।
हर साल बच्चों के प्रिय चाचा जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। बड़ी-बड़ी बातें की जाती है, लेकिन साल-दर-साल उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।
भारत में बाल-मजदूरी पर प्रतिबंध लगे 23 साल हो गए है, लेकिन विश्व में सबसे ज्यादा बाल मजदूर यहीं हैं। इनकी संख्या करीब छह करोड़ है। खदानों, कारखानों, चाय बागानों, होटलों, ढाबों, दुकानों आदि हर जगह इन्हें कमरतोड़ मेहनत करते हुए देखा जा सकता है। कच्ची उम्र में काम के बोझ ने इनके चेहरे से मासूमियत नोंच ली है।
इनमें से अधिकतर बच्चे शिक्षा से दूर खतरनाक और विपरीत स्थितियों में काम कर रहे है। उन्हें हिंसा और शोषण का सामना करना पड़ता है। इनमें से कई तो मानसिक बीमारियों के भी शिकार हो जाते हैं। बचपन खो करके भी इन्हे ढग से मजदूरी नहीं मिलती।
भारत में अशिक्षा, बेरोजगारी और असंतुलित विकास के कारण बच्चों से उनका बचपन छीनकर काम की भट्ठी में झोंक दिया जाता है। इसलिए जब तक इन समस्याओं का हल नहीं किया जाएगा, तब तक बाल श्रम को रोकना असंभव है। ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि सभी बच्चों को मुफ्त और बेहतर शिक्षा मिल सके। हर परिवार को कम से कम रोजगार, भोजन और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों। साथ ही बाल-मजदूरी से जुड़े सभी कानून और सामाजिक-कल्याण की योजनाएं कारगर ढंग से लागू हों।
देश में बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। ब्रिटेन की एक संस्था के सर्वे के अनुसार पूरी दुनिया में जितने कुपोषित बच्चे हैं, उनकी एक तिहाई संख्या भारत में है। यहा तीन साल तक के कम से कम 46 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसके अलावा प्रतिदिन औसतन 6,000 बच्चों की मौत होती है। इनमें 2,000 से लेकर 3,000 बच्चों की मौत कुपोषण के कारण होती है।
भारत में बच्चों का गायब होना भी एक बड़ी समस्या है। इनमें से अधिकतर बच्चों को संगठित गिरोहों द्वारा चुराया जाता है। ये गिरोह इन मासूमों से भीख मंगवाते हैं। अब तो मासूम बच्चों से छोटे-मोटे अपराध भी कराए जाने लगे है। पिछले एक साल में दिल्ली मे दो हजार से ज्यादा बच्चे गायब हुए। इन्हें कभी तलाश ही नहीं किया गया, क्योंकि ये सभी बच्चे बेहद गरीब घरों के थे।
यह स्थिति तो देश की राजधानी दिल्ली की है। पूरे देश की क्या स्थिति होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अगर गायब होने वाला बच्चा समृद्ध परिवार का होता है तो शासन और प्रशासन में ऊपर से लेकर नीचे तक हड़कंप मच जाता है।
यदि बच्चा गरीब घर से ताल्लुक रखता है तो पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती। पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई थी कि वह सिर्फ अमीरों के बच्चों को तलाशने में तत्परता दिखाती है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 80 प्रतिशत पुलिस वाले गुमशुदा बच्चों की तलाश में रुचि नहीं लेते। भारत में हर साल लगभग 45 हजार बच्चे गायब होते हैं और इनमें से 11 हजार बच्चे कभी नहीं मिलते।
संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव में 2007 मे भारत में बाल अधिकार संरक्षण आयोग गठित किया गया था। आयोग ने गुमशुदा बच्चों के मामले मे राच्य सरकारों को कई सुझाव और निर्देश दिए थे। इनमें से एक गुम होने वाले हर बच्चे की एफआईआर तुरंत दर्ज किए जाने के संदर्भ में था, लेकिन सच्चाई सबके सामने है।
बाल विवाह एक और बड़ी समस्या है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में जिन लड़कियों की बचपन में शादी कर दी जाती है, उनमें एक तिहाई से भी ज्यादा भारत से हैं। सालभर में लाखों बच्चिया इसके लिए अभिशप्त है। इन्हें भीषण शारीरिक और मानसिक यातना झेलनी पड़ती है।
बाल विवाह पर प्रतिबंध के बावजूद रीति-रिवाज, पिछड़ेपन ओर रूढि़वादिता के कारण अब भी देश के कई हिस्सों में लड़कियों को विकास का अवसर दिए बिना अंधे कुंए में धकेला जा रहा है। छोटी उम्र में विवाह से कई बार लड़कियों को बाल वैधव्य का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका जीवन मुसीबतों से घिर जाता है।
इसके अलावा बाल विवाह से कई बार वर-वधू के शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक विकास में विपरीत असर पड़ता है। बाल विवाह के कारण लड़कियों की पढ़ाई रुक जाती है। कम पढ़ी-लिखी महिला अंधविश्वासों और रूढि़यों से घिर जाती है। ऐसी पीढ़ी से देश व समाज हित की क्या उम्मीद की जा सकती है?
इससे दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि करीब 53 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण के शिकार हैं। इनमें केवल लड़किया ही नहीं, बल्कि लड़के भी हैं। पाच साल से 12 साल की उम्र के बीच यौन शोषण के शिकार होने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो बच्चों के मामले में भारत की स्थिति सबसे खराब है। प्रशासनिक अधिकारियों को इस तरह की कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती कि वह बच्चों के प्रति संवेदशनील होकर अपने दायित्व को समझें। बच्चे वोट बैंक नहीं होते इसलिए राजनीतिक पार्टिया दिखावे के लिए भी उनकी चिंता नहीं करतीं। सब बातें छोड़ भी दें तो सरकार बच्चों के लिए बेसिक शिक्षा तक नहीं उपलब्ध करवा पा रही है।
पूरे देश में स्कूलों का अब भी अभाव है। जहा स्कूल है भी, वहा कुव्यवस्था है। कहीं अध्यापकों की कमी है तो कहीं जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। 10 सितंबर को दिल्ली के खजूरी खास स्थित राजकीय वरिष्ठ बाल/बालिका विद्यालय में परीक्षा से पूर्व मची भगदड़ में पाच छात्रों की मौत हो गई थी, जबकि 32 छात्राएं घायल हुई थीं। इसके पीछे मुख्य वजह कुव्यवस्था थी। यह स्थिति देश की राजधानी की है। इससे पता चलता है कि हम देश के भविष्य के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्य संध्या बजाज का कहना है कि गुमशुदा बच्चों के अधिकाश मामलों में रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती। गुम होने वाले ज्यादातर बच्चे शोषण का शिकार होते है। इसलिए हर गुमशुदा बच्चे की रिपोर्ट जरूर दर्ज की जानी चाहिए। बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिलने से उनकी जिदंगी और बेहतर बन जाएगी।
हम उनसे सबक क्यों नहीं लेते
कई देशों में बच्चों के लिए अलग से लोकपाल नियुक्त हैं। सबसे पहले नार्वे ने 1981 में बाल अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक अधिकारों से युक्त लोकपाल की नियुक्ति की। बाद में आस्ट्रेलिया, कोस्टारिका, स्वीडन [1993], स्पेन [1996], फिनलैंड आदि देशों ने भी बच्चों के लिए लोकपाल की नियुक्ति की।
लोकपाल का कर्तव्य है बाल अधिकार आयोग के अनुसार बच्चों के अधिकारों को बढ़ावा देना और उनके हितों का समर्थन करना। यही नहीं, निजी और सार्वजनिक प्राधिकारियों में बाल अधिकारों के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करना भी उनके दायित्वों में है। कुछ देशों में तो लोकपाल सार्वजनिक विमर्शो में भाग लेकर जनता की अभिरुचि बाल अधिकारों के प्रति बढ़ाते हैं और जनता व नीति निर्धारकों के रवैये को प्रभावित करते हैं।
बच्चों के शोषण एवं बालश्रम की समस्याओं के मद्देनजर भारत में भी बच्चों के लिए स्वतंत्र लोकपाल व्यवस्था गठित करने की मांग अक्सर की जाती रही है, लेकिन सवाल यह है कि इतने संवैधानिक उपबंधों, नियमों-कानूनों, मंत्रालयों और आयोगों के बावजूद अगर बच्चों के अधिकारों का हनन हो रहा है तो समाज भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
कल हर बच्चा अपनी पुरानी पीढ़ी से मांगेगा हिसाब
कैलाश सत्यार्थी। हर साल की तरह फिर से 14 नवंबर यानी बाल दिवस आ गया। हर साल की तरह बच्चों के मसीहा चाचा नेहरु को याद करने का दिन। बच्चों को देश का भविष्य और कर्णधार बताने, उनकी तरक्की और शिक्षा के नए वायदे करने, स्कूली बच्चों के बीच कार्यक्रम करके नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षा-व्यापारियों के फोटो खिंचवाने और अखबार में खबर छपवाने का दिन।
आखिर कब तक हमारा देश अपने आपको और उन मासूम बच्चों को धोखा देता रहेगा, जिन्हें अब तक वह भरपेट रोटी और आजादी जैसी बुनियादी चीजें भी मुहैया नहीं करा सका। शिक्षा, स्वास्थ्य, बचपन का स्वाभिमान और भविष्य की गारंटी तो दूर की बात है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हाल ही में यूनीसेफ ने खुलासा किया है था कि दुनिया भर में पाच साल से कम उम्र में मौत के मुंह में समा जाने वाले लगभग 97 लाख बच्चों में से 21 लाख भारत के होते हैं। कम वजन के पैदा होने वाले साढ़े पंद्रह करोड़ शिशुओं में से साढ़े पाच करोड़ हमारे देश के होते हैं।
पाच से छह करोड़ बच्चे बाल मजदूरी के शिकार हैं। लाखों बच्चे जानवरों से भी कम कीमत में एक से दूसरी जगह खरीदे और बेचे जाते हैं। 40-50 हजार बच्चे मोबाइल फोन, बटुए, खिलौने या किसी सामान की तरह हर साल गायब कर दिए जाते हैं। अकेले देश की राजधानी दिल्ली में हर रोज औसतन छह बच्चे गायब किए जाते हैं। सड़कों पर जबरिया भीख मंगवाने के लिए अंधा बनाकर या हाथ-पाव काटने की कहानी स्लमडाग मिलियनायर की कल्पना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की असलियत है।
शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब किसी मासूम बच्ची से बलात्कार करने या उसकी हत्या कर देने की घटनाएं अखबारों में देखने को न मिलती हों। घरेलू बाल मजदूरी रोकने के लिए दो साल पहले एक कठोर कानूनी प्रावधान लाया गया था, लेकिन कभी किसी अदाकारा के घर तो कभी सरकारी अधिकारी और तथाकथित मध्यवर्गीय शिक्षित व्यवसायी के घर घरेलू बाल नौकरानियों को गर्म लोहे से दाग देने या बुरी तरह मारपीट करने की घिनौनी वारदातें आए दिन सामने आती हैं। मीडिया में थोड़ा बहुत शोर शराबा हो जाता है। अधिकारियों और स्वयंसेवी संगठनों के नेताओं के बाइट किसी चैनल में एक दो दिन चल जाते हैं और फिर वही ढाक के तीन पात।
बाल दिवस की रस्म अदायगी करने से पहले हमें अपने अंदर झाकना चाहिए। निजी सार्वजनिक और राजनैतिक ईमानदारी की भी जाच पड़ताल करनी चाहिए। अपनी खुद की संतानों के भविष्य को संवारने के लिए जो लोग घूसखोरी और भ्रष्टाचार तक में लिप्त पाए जाते हैं, वे दूसरों के बच्चों को गुलाम बनाने से नहीं कतराते। अपने बच्चों को महंगे से महंगे अंग्रेजी स्कूलों में दाखिल कराने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते हैं, लेकिन किसी चाय के ढाबे पर बेशर्मी से बच्चे के हाथ की चाय पीते हुए या जूते पालिश कराते हुए उन्हें यह एहसास तक नहीं होता कि भारत का भविष्य सिर्फ उनके बाल-गोपाल ही नहीं, दूसरे बच्चे भी हैं।
सार्वजनिक जीवन में दोहरे मानदंड की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि नेता-अधिकारी और अधिकारों की बात करने वाले बुद्धिजीवी कुतर्को का अंबार लगा देते हैं। मसलन, गरीब का बच्चा काम नहीं करेगा तो भूखा मर जाएगा या लड़की वेश्यावृत्ति करने लगेगी, इसलिए बेहतर है कि वह बाल मजदूरी करे। कुछ लोग कहते हैं कि देश के पास इतने संसाधन कहा कि हर बच्चे का गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई मुहैया कराई जा सके। यदि गरीब बच्चों को मंहगे अंग्रेजी स्कूलों में जबरन भर्ती कराया जाएगा तो वहा शिक्षा का स्तर खराब हो जाएगा आदि।
आखिर हम कब तक बच्चों के वर्तामन और भविष्य के साथ पाखंड करते रहेंगे? कब तक उनको धोखा देते रहेंगे? यह सच है कि अधिकाश बच्चे आज अपने आकाओं से जवाब मागने का माद्दा नहीं रखते, लेकिन आने वाले कल की असलियत आज से एकदम अलग होगी यह तय समझिए। सदियों से चले आ रहे पाखंड और बचपन विरोधी परंपराओं को कुछ बच्चों ने चुनौती देना शुरू कर दिया है। यह सैलाब रुकने वाला नहीं हैं। कल हर बच्चा अपनी पुरानी पीढ़ी से हिसाब जरूर मागेगा, तब हम उन्हें क्या जवाब देंगे?
साभार - दैनिक जागरण
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