Saturday, April 11, 2009
Tuesday, February 3, 2009
सभ्य समाज की गंदगी
हमारे सभ्य शहरों की असभ्य सड़कों पर केवल मंहगी गाड़ियां ही गरीबों और बेसहारा बच्चों की जिंदगी को नहीं रौंदती है. भारतीय फुटपाथ पर जिंदगी बिताने वाले 55 प्रतिशत से अधिक बच्चे यौन प्रताड़ना का शिकार हैं. यौन शोषित इन बच्चों की उम्र 5 से 12 साल के बीच की है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के एक अध्ययन से यह पता चला है। यह अध्ययन देश के 13 राज्यों में 12 हजार 447 बच्चों पर किया गया है। जिन राज्यों में सर्वे हुआ है उनमें आंध्र प्रदेष, असम, बिहार, दिल्ली, गोवा, गुजरात, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मिजोरम, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल हैं। यह खबर शायद सभी समाचारपत्र में नहीं छपी हो, पर खबर महत्पूर्ण मुद्दे की है। फुटपाथ पर जीवन बसर करने वाले तक सरकार अजादी के छह दशक बीत जाने पर भी नहीं पहुंच पाई। फुटपाथ पर बसर करने वालों की एक अच्छी तदात है।
जरा गौर करें 5 से 12 साल की बीच की उम्र ही क्या होती है। नन्हीं उम्र। समाज की अच्छी और बुरी बातों से अनजान उम्र। फुटपाथ पर रहने वाले कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ने के सपने भी नहीं देखते है। पर आजकल कॉन्वेंट स्कूलों के 12 साल के बच्चों को सेक्स की अच्छी-खासी समझ विकसित हो जाती है। यह उनके संगत का असर होता है। पर फुटपाथी बच्चे क्या करते है। कहीं भीख मांगते हैं, तो कहीं मजबूर मां-बाप के साथ दुत्कार भरी जिदंगी जीते हैं। ट्रेनों में यात्रियों के कचरे साफ कर पैसा मांगते हैं। कुछ समाान बेचते है। चैराहों पर रूकने वाली गाड़ियों के शीशे साफ कर अंदर बैठै व्यक्ति से कुछ देने की याचना करते है। इनका बसेरा यत्र-तत्र, अस्थायी होता है। इनका यौन शोषण कौन करता है। घनी बस्तियों और सभ्य समाज से दूर रहने वाले इन बच्चों के बीच कोई बाहर का व्यक्ति शायद ही इनका दुःख जानने समझने आता होगा। यह वर्ग समाज के मुख्य धारा से हमेषा कटा रहा है। साधारण-सी बात है। फुटपाथ पर ही जिंदगी गुजर-बसर करने वाले वयस्क ही इनका यौन शोषण करते हैं।
यहां की बात यहीं रह जाती है। सभ्य समाज इन्हें गंदगी मानता है। गंदगी में घिनौने कृत्य के कौन-कौन से बुलबुले उग रहे हैं, इससे सभ्य समाज को मतलब नहीं है। पर इसका मतलब यह नहीं कि हम इसके प्रति आंख मूंद लें। छोटी-छोटी अपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते-देते फुटपाथ के कई बच्चे वयस्क होते-होते बडे़ अपराधी बन जाते हैं। फुटपाथ से हट कर आम आदमी को बीच पहुंच कर असमाजिक गतिविधियों को अंजाम देते है।
स्लम इलाकों के बच्चों को पढ़ा-लिखा कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं सक्रिय हंै। सरकार अनुदान भी देती है। पर फुटपाथ पर जीवन गुजर बसर करने वाले हमेषा उपेक्षित रहे हैं। कितने बच्चे फुटपाथ पर जीवन गुजारते हैं, इसका अनुमानित आंकड़ा मिल सकता है, प्रमाणिक नहीं। कभी-कभार खबरें आती हैं कि स्थनीय निकाय विशेषकर महानगर पालिका, जिला पंचायत ऐसे घुमंतु बच्चों को पढ़ा कर समाज से मुख्य धारा से जोड़ने की योजना बनाती है। फंड तय होता है। बच्चों का सर्वे होता है। योजना को कार्यरूप देने की शुरूआत से पहले ही वित्तिय वर्श समाप्त हो जाता हैं। फिर सब कुछ नये सिरे से शुरू करने की बात की जाती है। इसी बीच सर्वे और पढ़ाने की पहल तक निर्धारित फंड का काफी पैसा खर्च हो चुका रहता है। सरकार एनजीओ के माध्यम से भी ऐसे बच्चों के कल्याण पर भारी भरकम राशि लुटा रही है। सब कुछ चलता रहता है, पर सकारात्मक कुछ भी नहीं होता हैं।
ऐसे बच्चों को का भला तब तक नहीं होगा, तब सरकार इनके जिम्मेदार अभिभावकत्व के रूप में सामने न आए। समाज कल्याण विभाग देष के कई जिलों में छोटे और बड़ों बच्चों के लिए अवासीय व्यवस्था उपलब्ध कराता है। पढ़ाता है। फुटपाथी बच्चों के लिए यह वरदान साबित हो सकता है, पर इसका लाभ नहीं मिल पा रहा हैं। ऐसे सरकारी आश्रय में गरीब बच्चे तो रहते हैं, पर पर फुटपाथी बच्चे नहीं। यदि इन बच्चों को कोई स्वयंसेवी सरकारी आश्रय में पहुंचाना भी चाहे तो वह सफल नहीं हो सकता है, क्योकि ऐसे आश्रय में जाति वर्ग में दायरे में आने की खास बंदिषे हैं। यदि फुटपाथी संबंधित जाति का भी हो, तो प्रमाणपत्र किस आधार पर बनेगा। इन बच्चों के अभिभावकों के पास न तो राषनकार्ड होता है और न ही मतदाता पहचान पत्र। देष के प्रखंड और तहसील कार्यालयो में आसानी से ऐसे प्रमाणपत्र बनते भीन हीं है। अब, जब मंत्रालय ने ऐसे बच्चों पर सर्वे करकार कड़वी सच्चाई को जान लिया है, तो बिना शर्त इनकी समुचित परवरिश के लिए ठोस कदम उठाये। जिससे कि इनका अब और यौन शोषण नहीं और ये बड़े होकर मन में कुंडा लिए समाज से अलग रहकर समाज और देश के लिए घातक नागरिक न बनें।
Sunday, January 25, 2009
Friday, January 2, 2009
स्ट्रीट चिल्ड्रेन
• एक अरब आबादी वाला भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसमें बच्चों की आबादी 40 करोड़ के करीब है,
• भारत में एड्स से संक्रमित 55,764 मामलों में 2,112 बच्चे हैं,
• एचआईवी/एड्स संक्रमण के 4 करोड़ 20 लाख मामलों में 14 फीसदी मामले ऐसे बच्चों के अनुमानित हैं जो 14 साल से कम उम्र के हैं,
• आईएलओ द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि संक्रमित माता-पिता के बच्चों के साथ काफी भेदभाव किया जाता है जिनमें 35% को मूलभूत सुविधा से वंचित होना पड़ता है और 17% को अपनी आमदनी के लिए घटिया स्तर के काम करने पड़ते हैं,
• भारत में बाल श्रम की जटिल समस्या है जो गरीबी से गहरे तौर पर जुड़ी है,
• वर्ष 1991 की जनगणना के मुताबिक भारत में 11.28 मिलियन बाल श्रमिक हैं,
• बाल श्रम का 85% संख्य़ा ग्रामीण इलाकों में पाया जाता है। यह संख्या पिछ्ले दशक में बढ़ी है,
• स्ट्रीट चिल्ड्रेन ऐसे बच्चे होते हैं जिनका अपने परिवारों से ज्यादा वास्तविक घर सड़क होता है। यह ऐसी स्थिति है जिसमें उन्हें कोई सुरक्षा, निगरानी या जिम्मेदार वयस्कों से कोई दिशा-निर्देश नहीं मिलती। मानवाधिकार संगठन के अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 1 करोड़ 80 बच्चे सड़कों पर रहते या काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे अपराधों, यौनवृत्तियों, सामूहिक हिंसा तथा नशीले पदार्थों के शिकार हैं।
स्ट्रीट चिल्ड्रेन एक ऐसा शब्द है जो शहर की सड़कों पर रहने वाले बच्चों के लिए प्रयोग होता है। वे परिवार की देखभाल और संरक्षण से वंचित होते हैं। सड़कों पर रहने वाले ज्यादातर बच्चे 5 से 17 वर्ष के हैं और अलग-अलग शहरों में उनकी जनसंख्या भिन्न है। स्ट्रीट चिल्ड्रेन निर्जन भवनों, गत्तों के बक्सों, पार्कों अथवा सड़कों पर रहते हैं। स्ट्रीट चिल्ड्रेन को परिभाषित करने के लिए काफी कुछ लिखा जा चुका है पर बड़ी कठिनाई यह है कि उनका कोई ठीक-ठीक वर्ग नहीं है, बल्कि उनमें से कुछ जहां थोड़े समय सड़कों पर बिताते हैं और बुरे चरित्र वाले वयस्कों के साथ सोते हैं। वहीं कुछ ऐसे हैं जो सारा समय सड़कों पर ही बिताते हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता।
यूनिसेफ द्वारा दी गई परिभाषा व्यापक रूप से मान्य है, जिसके तहत स्ट्रीट चिल्ड्रेन को दो मुख्य वर्गों में बांटा गया है-
• सड़कों पर रहने वाले बच्चे भीख मांगने से लेकर बिक्री करने जैसे कुछ आर्थिक क्रियाकलापों में लिप्त रहते हैं। उनमें से ज्यादातर शाम को घर जाकर अपनी आमदनी को अपने परिवारों में दे देते हैं। वे स्कूल जा सकते हैं तथा उनमें परिवार से जुड़े रहने की भी भावना हो सकती है। परिवार की आर्थिक बदहाली के कारण ये बच्चे आखिरकार स्थाई तौर पर सड़कों पर की ही जिंदगी चुन लेते हैं।
• सड़कों पर रहने वाले बच्चे वास्तव में सड़कों पर (या आम पारिवारिक माहौल से बाहर) ही रहते हैं। उनके बीच पारिवारिक बंधन मौजूद हो सकता है, पर यह काफी हल्का होता है जो आकस्मिकतौर पर या कभी-कभी ही कायम होता है।
• भारत में एड्स से संक्रमित 55,764 मामलों में 2,112 बच्चे हैं,
• एचआईवी/एड्स संक्रमण के 4 करोड़ 20 लाख मामलों में 14 फीसदी मामले ऐसे बच्चों के अनुमानित हैं जो 14 साल से कम उम्र के हैं,
• आईएलओ द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि संक्रमित माता-पिता के बच्चों के साथ काफी भेदभाव किया जाता है जिनमें 35% को मूलभूत सुविधा से वंचित होना पड़ता है और 17% को अपनी आमदनी के लिए घटिया स्तर के काम करने पड़ते हैं,
• भारत में बाल श्रम की जटिल समस्या है जो गरीबी से गहरे तौर पर जुड़ी है,
• वर्ष 1991 की जनगणना के मुताबिक भारत में 11.28 मिलियन बाल श्रमिक हैं,
• बाल श्रम का 85% संख्य़ा ग्रामीण इलाकों में पाया जाता है। यह संख्या पिछ्ले दशक में बढ़ी है,
• स्ट्रीट चिल्ड्रेन ऐसे बच्चे होते हैं जिनका अपने परिवारों से ज्यादा वास्तविक घर सड़क होता है। यह ऐसी स्थिति है जिसमें उन्हें कोई सुरक्षा, निगरानी या जिम्मेदार वयस्कों से कोई दिशा-निर्देश नहीं मिलती। मानवाधिकार संगठन के अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 1 करोड़ 80 बच्चे सड़कों पर रहते या काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे अपराधों, यौनवृत्तियों, सामूहिक हिंसा तथा नशीले पदार्थों के शिकार हैं।
स्ट्रीट चिल्ड्रेन एक ऐसा शब्द है जो शहर की सड़कों पर रहने वाले बच्चों के लिए प्रयोग होता है। वे परिवार की देखभाल और संरक्षण से वंचित होते हैं। सड़कों पर रहने वाले ज्यादातर बच्चे 5 से 17 वर्ष के हैं और अलग-अलग शहरों में उनकी जनसंख्या भिन्न है। स्ट्रीट चिल्ड्रेन निर्जन भवनों, गत्तों के बक्सों, पार्कों अथवा सड़कों पर रहते हैं। स्ट्रीट चिल्ड्रेन को परिभाषित करने के लिए काफी कुछ लिखा जा चुका है पर बड़ी कठिनाई यह है कि उनका कोई ठीक-ठीक वर्ग नहीं है, बल्कि उनमें से कुछ जहां थोड़े समय सड़कों पर बिताते हैं और बुरे चरित्र वाले वयस्कों के साथ सोते हैं। वहीं कुछ ऐसे हैं जो सारा समय सड़कों पर ही बिताते हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता।
यूनिसेफ द्वारा दी गई परिभाषा व्यापक रूप से मान्य है, जिसके तहत स्ट्रीट चिल्ड्रेन को दो मुख्य वर्गों में बांटा गया है-
• सड़कों पर रहने वाले बच्चे भीख मांगने से लेकर बिक्री करने जैसे कुछ आर्थिक क्रियाकलापों में लिप्त रहते हैं। उनमें से ज्यादातर शाम को घर जाकर अपनी आमदनी को अपने परिवारों में दे देते हैं। वे स्कूल जा सकते हैं तथा उनमें परिवार से जुड़े रहने की भी भावना हो सकती है। परिवार की आर्थिक बदहाली के कारण ये बच्चे आखिरकार स्थाई तौर पर सड़कों पर की ही जिंदगी चुन लेते हैं।
• सड़कों पर रहने वाले बच्चे वास्तव में सड़कों पर (या आम पारिवारिक माहौल से बाहर) ही रहते हैं। उनके बीच पारिवारिक बंधन मौजूद हो सकता है, पर यह काफी हल्का होता है जो आकस्मिकतौर पर या कभी-कभी ही कायम होता है।
भीख मांगता बच्चा
धुप में
झुलसता हुआ
रेत की आग में
जलता हुआ
एक भीख मांगता बच्चा
करुण स्वर में
पुकार कर
दर्शनार्थियों को
आकर्षित करता
एक भीख मांगता बच्चा
वक्त के
क्रूर चक्र में
भाग्य रेखाओं की
उलझन में
उलझा हुआ
एक भीख मांगता बच्चा
अपंगता का
वरदान लिए
भाग्य में श्राप लिए
आसमान की ओर निहारता
एक भीख मांगता बच्चा
झुलसता हुआ
रेत की आग में
जलता हुआ
एक भीख मांगता बच्चा
करुण स्वर में
पुकार कर
दर्शनार्थियों को
आकर्षित करता
एक भीख मांगता बच्चा
वक्त के
क्रूर चक्र में
भाग्य रेखाओं की
उलझन में
उलझा हुआ
एक भीख मांगता बच्चा
अपंगता का
वरदान लिए
भाग्य में श्राप लिए
आसमान की ओर निहारता
एक भीख मांगता बच्चा
Tuesday, October 28, 2008
बाल-न्याय (संरक्षा एवं सुरक्षा) अधिनियम
बाल-न्याय (संरक्षा एवं सुरक्षा) अधिनियम 2000 तरुण या बालक (जो 18 वर्ष से कम आयु के हों) के निम्न जरूरतों से संबंधितहैः
• संरक्षा एवं सुरक्षा की जरूरत
• कानूनी कार्रवाई का सामना
इन बच्चों को संरक्षा एवं सुरक्षा की जरूरत
2 (डी) के अनुसार जिन बच्चों को संरक्षा एवं सुरक्षा की जरूरत है, उससे मतलब है -
• जो बिना घर के या जीविका के साधन के बिना पाया जाता है।
• जिसके माँ-बाप या संरक्षक देखभाल करने में सक्षम न हों।
• जो अनाथ या जिसके माँ-बाप ने परित्यक्त कर दिया हो या जो खो गया हो या घर से भागा हुआ बच्चा या फिर काफी जाँच पड़ताल के बाद भी जिसके माँ-बाप का पता नहीं लगाया जा सकता।
• जो संभोग या अनैतिक कार्य से शोषित, सताया हुआ या पीड़ित हो या जो इस तरह के शोषण के प्रति संवेदनशील हों।
• जो नशा या बाल-व्यापार से पीड़ित हों
• जो किसी सशस्त्र संघर्ष, नागरिक प्रतिरोध या प्राकृतिक आपदाओं के शिकार हों।
बाल-कल्याण समिति: इस कानून के अनुसार प्रत्येक राज्य सरकार को, राज्य के प्रत्येक जिले या जिला-समूह में बालकों की देखभाल, सुरक्षा, इलाज, विकास एवं पुनर्वास के लिए एक या एक से अधिक बाल-सरंक्षा एवं सुरक्षा समिति का गठन करना है। यह समिति जरूरतमंद बच्चों के मूलभूत जरूरत की व्यवस्था करेगी और उसके मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगी।
समिति के समक्ष प्रस्तुत
कोई भी बालक जिसे संरक्षा एवं सुरक्षा की जरूरत है उसे समिति के समक्ष - विशेष बाल पुलिस ईकाई, निर्दिष्ट पुलिस अधिकारी, लोक सेवक, चाइल्ड लाइन, राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एवं पंजीकृत स्वयं सेवी संस्था, सामाजिक कार्यकर्ता या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत कोई अन्य व्यक्ति या संस्थाएँ या स्वयं बालक / बालिका उपस्थित होकर अपनी बात कह सकता है।
घटना का सुनने जानने के बाद बाल कल्याण समिति उस बच्चे को बाल सुधार गृह भेजने का निर्देश दे सकती है और उस मामले की त्वरित गति से जाँच के लिए किसी सामाजिक कार्यकर्ता या बाल कल्याण अधिकारी को अधिकृत कर सकती है।
जाँच के बाद यदि यह पाया जाता है कि संबंधित बालक का न तो परिवार और न ही कोई प्रत्यक्ष आधार है तो उसे बाल सुधार गृह या आश्रय गृह में तब तक रखने के लिए कहा जा सकता है जब तक कि या तो उसके पुनर्वास के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो जाती या फिर वह 18 वर्ष के अधिक का नहीं हो जाता।
कानूनी कार्रवाइयों का सामना कर रहे बच्चे
कानून से संघर्षरत बच्चे का मतलब है ऐसे बच्चे जिसपर किसी गैर कानूनी कार्य को करने का अपराध है।
बाल-न्याय बोर्ड
प्रत्येक राज्य सरकार राज्य के प्रत्येक जिले या जिला-समूह में बालकों की देखभाल, सुरक्षा, इलाज, विकास एवं पुनर्वास के लिए एक या एक से अधिक बाल सरंक्षा एवं सुरक्षा समिति का गठन करे ताकि कानून से संघर्षरत बच्चे को जमानत दी जा सके और उस बच्चे के हित में उस मामले का निपटारा किया जा सके।
मादक द्रव्य तथा पदार्थों का दुरुपयोग
मादक द्रव्य तथा विषैले पदार्थ अधिनियम 1985
यह कानून मादक द्रव्य तथा विषैले पदार्थों के उत्पादन, अपने पास रखने, उसे कहीं लाने-ले जाने, खरीद-बिक्री को अवैध घोषित करता है, तथा इस कार्य में संलग्न व्यक्ति आदि या इसके अवैध व्यापारी के लिए दंड का प्रावधान करता है।
अपराधी के द्वारा हथियार या हिंसा का उपयोग करना या उपयोग की धमकी देना, नाबालिगों का इस अपराध के लिए उपयोग करना, किसी शिक्षण संस्थान या समाज सेवा केन्द्र में अपराध करने वाले के लिए अधिक दंड का प्रावधान है।
मादक द्रव्य तथा नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार निवारण अधिनियम 1988
इस कानून के अनुसार वैसे व्यक्ति जो बालकों को मादक द्रव्यों का अवैध व्यापार के लिए उपयोग करते हैं उन्हें सहयोगी व षडयंत्रकारी के रूप में गिरफ्तार कर उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है।
बाल-न्याय (बच्चों की संरक्षा एवं सुरक्षा) अधिनियम 2000
इस अधिनियम का भाग 2 (डी) मादक द्रव्यों के सेवन या व्यापार में लगे असहाय बच्चे को संरक्षा एवं सुरक्षा के लिए जरूरतमंद बच्चे के रूप में परिभाषित किया गया है।
बाल-भिक्षा
जब किसी बच्चे को भिक्षाटन के लिए विवश किया जाता या उसके लिए उपयोग किया जाता, तो वैसे व्यक्ति को निम्न कानून के तहत सजा दी जा सकती है -
बाल-न्याय अधिनियम 2000
किसी किशोर या बच्चे को रोजगार देकर या भिक्षा माँगने के लिए उपयोग किया जाता है तो उसे विशिष्ट अपराध मानकर दोषी के लिए सजा की व्यवस्था है (भाग 24)
बाल-न्याय वास्तव में भिक्षा माँगने जैसे अनैतिक कार्यों के माध्यम से बच्चों का किये जा रहे शोषण, प्रताड़ना, दुरुपयोग को संरक्षा एवं सुरक्षा के लिए जरूरतमंद बच्चे के रूप में स्वीकार करता है।
भारतीय दंड संहिता
भिक्षाटन कराने के लिए नाबालिग बच्चों का अपहरण या अपाहिज बनाना भारतीय दंड संहिता के भाग 363 ए के तहत दंडनीय अपराध है।
बाल-अपराध या कानून से संघर्षरत बच्चे
ऐसे बच्चे जो अपराध करते हैं उन्हें वयस्क व्यक्ति की तुलना में कठोर दंड से रक्षा की जाए और उसे संरक्षा एवं सुरक्षा के लिए जरूरतमंद बच्चे के रूप में स्वीकार किया जाए न कि बाल न्याय (बच्चों की संरक्षा एवं सुरक्षा) अधिनियम 2000 के तहत अपराधी माना जाए।
इस कानून के तहत वैसे प्रत्येक बच्चे जिसपर किसी अपराध के लिए मुकदमा चल रहा है उसे यह अधिकार है कि उसे अनिवार्य रूप से जमानत दी जाए बशर्ते कि उससे किसी के जीवन को या उस बच्चे को कोई खतरा न हो।
किसी तरह के अपराध में शामिल बच्चे को जेल भेजने की बजाय कानून उसके प्रति सुधारवादी रूख अपनाता है और उसे सलाह या चेतावनी देकर निश्चित अवधि को छोड़ देता या फिर उसे बाल-सुधार गृह में भेज दिया जाता है।
• संरक्षा एवं सुरक्षा की जरूरत
• कानूनी कार्रवाई का सामना
इन बच्चों को संरक्षा एवं सुरक्षा की जरूरत
2 (डी) के अनुसार जिन बच्चों को संरक्षा एवं सुरक्षा की जरूरत है, उससे मतलब है -
• जो बिना घर के या जीविका के साधन के बिना पाया जाता है।
• जिसके माँ-बाप या संरक्षक देखभाल करने में सक्षम न हों।
• जो अनाथ या जिसके माँ-बाप ने परित्यक्त कर दिया हो या जो खो गया हो या घर से भागा हुआ बच्चा या फिर काफी जाँच पड़ताल के बाद भी जिसके माँ-बाप का पता नहीं लगाया जा सकता।
• जो संभोग या अनैतिक कार्य से शोषित, सताया हुआ या पीड़ित हो या जो इस तरह के शोषण के प्रति संवेदनशील हों।
• जो नशा या बाल-व्यापार से पीड़ित हों
• जो किसी सशस्त्र संघर्ष, नागरिक प्रतिरोध या प्राकृतिक आपदाओं के शिकार हों।
बाल-कल्याण समिति: इस कानून के अनुसार प्रत्येक राज्य सरकार को, राज्य के प्रत्येक जिले या जिला-समूह में बालकों की देखभाल, सुरक्षा, इलाज, विकास एवं पुनर्वास के लिए एक या एक से अधिक बाल-सरंक्षा एवं सुरक्षा समिति का गठन करना है। यह समिति जरूरतमंद बच्चों के मूलभूत जरूरत की व्यवस्था करेगी और उसके मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगी।
समिति के समक्ष प्रस्तुत
कोई भी बालक जिसे संरक्षा एवं सुरक्षा की जरूरत है उसे समिति के समक्ष - विशेष बाल पुलिस ईकाई, निर्दिष्ट पुलिस अधिकारी, लोक सेवक, चाइल्ड लाइन, राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एवं पंजीकृत स्वयं सेवी संस्था, सामाजिक कार्यकर्ता या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत कोई अन्य व्यक्ति या संस्थाएँ या स्वयं बालक / बालिका उपस्थित होकर अपनी बात कह सकता है।
घटना का सुनने जानने के बाद बाल कल्याण समिति उस बच्चे को बाल सुधार गृह भेजने का निर्देश दे सकती है और उस मामले की त्वरित गति से जाँच के लिए किसी सामाजिक कार्यकर्ता या बाल कल्याण अधिकारी को अधिकृत कर सकती है।
जाँच के बाद यदि यह पाया जाता है कि संबंधित बालक का न तो परिवार और न ही कोई प्रत्यक्ष आधार है तो उसे बाल सुधार गृह या आश्रय गृह में तब तक रखने के लिए कहा जा सकता है जब तक कि या तो उसके पुनर्वास के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो जाती या फिर वह 18 वर्ष के अधिक का नहीं हो जाता।
कानूनी कार्रवाइयों का सामना कर रहे बच्चे
कानून से संघर्षरत बच्चे का मतलब है ऐसे बच्चे जिसपर किसी गैर कानूनी कार्य को करने का अपराध है।
बाल-न्याय बोर्ड
प्रत्येक राज्य सरकार राज्य के प्रत्येक जिले या जिला-समूह में बालकों की देखभाल, सुरक्षा, इलाज, विकास एवं पुनर्वास के लिए एक या एक से अधिक बाल सरंक्षा एवं सुरक्षा समिति का गठन करे ताकि कानून से संघर्षरत बच्चे को जमानत दी जा सके और उस बच्चे के हित में उस मामले का निपटारा किया जा सके।
मादक द्रव्य तथा पदार्थों का दुरुपयोग
मादक द्रव्य तथा विषैले पदार्थ अधिनियम 1985
यह कानून मादक द्रव्य तथा विषैले पदार्थों के उत्पादन, अपने पास रखने, उसे कहीं लाने-ले जाने, खरीद-बिक्री को अवैध घोषित करता है, तथा इस कार्य में संलग्न व्यक्ति आदि या इसके अवैध व्यापारी के लिए दंड का प्रावधान करता है।
अपराधी के द्वारा हथियार या हिंसा का उपयोग करना या उपयोग की धमकी देना, नाबालिगों का इस अपराध के लिए उपयोग करना, किसी शिक्षण संस्थान या समाज सेवा केन्द्र में अपराध करने वाले के लिए अधिक दंड का प्रावधान है।
मादक द्रव्य तथा नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार निवारण अधिनियम 1988
इस कानून के अनुसार वैसे व्यक्ति जो बालकों को मादक द्रव्यों का अवैध व्यापार के लिए उपयोग करते हैं उन्हें सहयोगी व षडयंत्रकारी के रूप में गिरफ्तार कर उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है।
बाल-न्याय (बच्चों की संरक्षा एवं सुरक्षा) अधिनियम 2000
इस अधिनियम का भाग 2 (डी) मादक द्रव्यों के सेवन या व्यापार में लगे असहाय बच्चे को संरक्षा एवं सुरक्षा के लिए जरूरतमंद बच्चे के रूप में परिभाषित किया गया है।
बाल-भिक्षा
जब किसी बच्चे को भिक्षाटन के लिए विवश किया जाता या उसके लिए उपयोग किया जाता, तो वैसे व्यक्ति को निम्न कानून के तहत सजा दी जा सकती है -
बाल-न्याय अधिनियम 2000
किसी किशोर या बच्चे को रोजगार देकर या भिक्षा माँगने के लिए उपयोग किया जाता है तो उसे विशिष्ट अपराध मानकर दोषी के लिए सजा की व्यवस्था है (भाग 24)
बाल-न्याय वास्तव में भिक्षा माँगने जैसे अनैतिक कार्यों के माध्यम से बच्चों का किये जा रहे शोषण, प्रताड़ना, दुरुपयोग को संरक्षा एवं सुरक्षा के लिए जरूरतमंद बच्चे के रूप में स्वीकार करता है।
भारतीय दंड संहिता
भिक्षाटन कराने के लिए नाबालिग बच्चों का अपहरण या अपाहिज बनाना भारतीय दंड संहिता के भाग 363 ए के तहत दंडनीय अपराध है।
बाल-अपराध या कानून से संघर्षरत बच्चे
ऐसे बच्चे जो अपराध करते हैं उन्हें वयस्क व्यक्ति की तुलना में कठोर दंड से रक्षा की जाए और उसे संरक्षा एवं सुरक्षा के लिए जरूरतमंद बच्चे के रूप में स्वीकार किया जाए न कि बाल न्याय (बच्चों की संरक्षा एवं सुरक्षा) अधिनियम 2000 के तहत अपराधी माना जाए।
इस कानून के तहत वैसे प्रत्येक बच्चे जिसपर किसी अपराध के लिए मुकदमा चल रहा है उसे यह अधिकार है कि उसे अनिवार्य रूप से जमानत दी जाए बशर्ते कि उससे किसी के जीवन को या उस बच्चे को कोई खतरा न हो।
किसी तरह के अपराध में शामिल बच्चे को जेल भेजने की बजाय कानून उसके प्रति सुधारवादी रूख अपनाता है और उसे सलाह या चेतावनी देकर निश्चित अवधि को छोड़ देता या फिर उसे बाल-सुधार गृह में भेज दिया जाता है।
Sunday, September 28, 2008
फुटपाथ पर रहने वाले बच्चे
फुटपाथ पर रहने वाले ज्यादातर बच्चे घर से भागे हुए होते हैं। वे अपने घरों से जीवन में अच्छे अवसर प्राप्त करने के लिए या शहरी ठाट-बाट के लिए या पढ़ाई करने के लिए अपने अभिभावकों द्वारा मिल रहे दबाव, पारिवारिक लड़ाई झगड़ों की वजह से घर से शहर भाग जाते हैं और जहाँ वे बहुत ही दयनीय स्थिति में जीवन व्यतीत करते हैं।
फुटपाथ के बच्चे कभी भी खराब नहीं होते। वह जिन परिस्थितियों में रहते हैं वे परिस्थितियाँ ही खराब होती हैं। इन्हें दो वक्त का खाना नहीं मिलता और बुरे व्यवहार के शिकार होते हैं । एक बार वे रास्ते में आ जाते हैं तो वे दुर्व्यवहार और उससे सम्बन्धित समस्याओ में फँस जाते हैं। यह छोटे बच्चे अपने से बड़े बच्चों के सम्पर्क में आकर कचड़ा चुनने या दूसरे काम जो बिना किसी कष्ट से मिल जाता है या गैर कानूनी काम जैसे जेब काटना, भीख माँगना, नशीले सामानों को बेचने जैसे कामों में लग जाते हैं।
बच्चे निम्न कारणों से घर से भागते हैं -
• बेहतर जीवन अवसर के लिए
• शहरी चकाचौंध
• बड़ों का दबाव
• खराब पारिवारिक सम्बन्ध
• अपने माता-पिता द्वारा परित्यक्त किये जाने पर
• माता-पिता तथा अध्यापकों द्वारा मारे जाने के डर से
• यौन सम्बन्धी दुर्व्यवहार
• जातीय भेदभाव
• लिंग संबंधी भेदभाव
• अपंगता
• एचआईवी/ एड्स की वजह से भेदभाव
फुटपाथी बच्चों का यौन शोषण, प्रेक्षण गृह में लाया गया (एक अध्ययन, वर्ष 2003-04) (रिपोर्टः दिप्ती पगारे, जी. एस. मीणा, आर. सी. जीलोहा व एम. एम. सिंह, भारतीय बाल चिकित्सा, सामुदायिक औषधि एवं मनोचिकित्सा विभाग, मौलाना आज़ाद महाविद्यालय। इस अध्ययन के दौरान दिल्ली के एक प्रेक्षण केन्द्र में रहने वाले बालकों के बीच किये गये सर्वेक्षण के दौरान यह बात सामने आई कि उसमें रहने वाले अधिकतर बच्चे फुटपाथ पर रहने वाले थे और उनमें से 38.1 प्रतिशत बच्चे यौन सम्बन्धी दुर्व्यवहार के शिकार थे। उन लोगों का जब अस्पतालों में जाँच कराया गया तो उनमे से 61.1 प्रतिशत बच्चों के शरीर पर जख्म के निशान थे जबकि 40.2 प्रतिशत बच्चों ने उनके साथ हुए यौन दुर्व्यवहार निशान दिखाए। 44 प्रतिशत बच्चों के साथ जबरन यौन दुर्व्यवहार किये और उनमें से 25 प्रतिशत बच्चों में यौन सम्बन्धी रोगों के निशान पाये गये थे। इन ब्चों के यौन शोषण जैसी घटनाएँ अधिकतर अपरिचित व्यक्ति द्वारा ही किया गया था।
फुटपाथ के बच्चे कभी भी खराब नहीं होते। वह जिन परिस्थितियों में रहते हैं वे परिस्थितियाँ ही खराब होती हैं। इन्हें दो वक्त का खाना नहीं मिलता और बुरे व्यवहार के शिकार होते हैं । एक बार वे रास्ते में आ जाते हैं तो वे दुर्व्यवहार और उससे सम्बन्धित समस्याओ में फँस जाते हैं। यह छोटे बच्चे अपने से बड़े बच्चों के सम्पर्क में आकर कचड़ा चुनने या दूसरे काम जो बिना किसी कष्ट से मिल जाता है या गैर कानूनी काम जैसे जेब काटना, भीख माँगना, नशीले सामानों को बेचने जैसे कामों में लग जाते हैं।
बच्चे निम्न कारणों से घर से भागते हैं -
• बेहतर जीवन अवसर के लिए
• शहरी चकाचौंध
• बड़ों का दबाव
• खराब पारिवारिक सम्बन्ध
• अपने माता-पिता द्वारा परित्यक्त किये जाने पर
• माता-पिता तथा अध्यापकों द्वारा मारे जाने के डर से
• यौन सम्बन्धी दुर्व्यवहार
• जातीय भेदभाव
• लिंग संबंधी भेदभाव
• अपंगता
• एचआईवी/ एड्स की वजह से भेदभाव
फुटपाथी बच्चों का यौन शोषण, प्रेक्षण गृह में लाया गया (एक अध्ययन, वर्ष 2003-04) (रिपोर्टः दिप्ती पगारे, जी. एस. मीणा, आर. सी. जीलोहा व एम. एम. सिंह, भारतीय बाल चिकित्सा, सामुदायिक औषधि एवं मनोचिकित्सा विभाग, मौलाना आज़ाद महाविद्यालय। इस अध्ययन के दौरान दिल्ली के एक प्रेक्षण केन्द्र में रहने वाले बालकों के बीच किये गये सर्वेक्षण के दौरान यह बात सामने आई कि उसमें रहने वाले अधिकतर बच्चे फुटपाथ पर रहने वाले थे और उनमें से 38.1 प्रतिशत बच्चे यौन सम्बन्धी दुर्व्यवहार के शिकार थे। उन लोगों का जब अस्पतालों में जाँच कराया गया तो उनमे से 61.1 प्रतिशत बच्चों के शरीर पर जख्म के निशान थे जबकि 40.2 प्रतिशत बच्चों ने उनके साथ हुए यौन दुर्व्यवहार निशान दिखाए। 44 प्रतिशत बच्चों के साथ जबरन यौन दुर्व्यवहार किये और उनमें से 25 प्रतिशत बच्चों में यौन सम्बन्धी रोगों के निशान पाये गये थे। इन ब्चों के यौन शोषण जैसी घटनाएँ अधिकतर अपरिचित व्यक्ति द्वारा ही किया गया था।
Subscribe to:
Posts (Atom)
